पर्वतारोहियों ने ग्लोबल वार्मिंग पर जताई गंभीर चिंता
उत्तरकाशी।
उत्तरकाशी और हिमाचल प्रदेश के पर्वतारोहियों की एक तीन सदस्यीय टीम ने समुद्र तल से लगभग 6001 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ठेलू पर्वत पर सफलतापूर्वक आरोहण कर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया है। गंगोत्री ग्लेशियर क्षेत्र की चोटियों में इस वर्ष का यह पहला सफल आरोहण माना जा रहा है, जो पर्वतारोहिता के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है। हालांकि, इस ऐतिहासिक सफलता के साथ ही दल ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से पिघलते ग्लेशियरों और ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभावों को लेकर गंभीर चिंता भी व्यक्त की है।

पर्वतारोही दल का नेतृत्व भटवाड़ी के बयाणा गांव निवासी राजेश ठाकुर ने किया। उनके साथ दल में हिमाचल प्रदेश की महिला पर्वतारोही शालिनी शर्मा और उत्तरकाशी के डिडसारी गांव निवासी उत्तम सिंह शामिल रहे। राजेश ठाकुर ने बताया कि इस अभियान की शुरुआत 22 मई को गंगोत्री से हुई थी। दल ने गोमुख और तपोवन के कठिन ट्रैक को पार करते हुए रक्तवन क्षेत्र में अपना बेस कैंप स्थापित किया। इसके बाद चढ़ाई का सिलसिला जारी रखते हुए टीम ने बुधवार सुबह 10:40 बजे ठेलू पर्वत के शिखर पर पहुंचकर तिरंगा फहराया और सफल आरोहण दर्ज किया। इस पूरे अभियान में सपोर्ट स्टाफ ने भी टीम को भरपूर सहयोग प्रदान किया।
उपलब्धि के साथ-साथ पर्वतारोहियों ने हिमालय के बदलते स्वरूप पर भी चिंता जताई है। राजेश ठाकुर के अनुसार, करीब पांच वर्ष पूर्व तक ठेलू पर्वत बेस कैंप से लेकर शिखर तक पूरी तरह से बर्फ से ढका रहता था। वर्तमान में स्थिति यह है कि पर्वत के कई हिस्सों से बर्फ लगभग गायब हो चुकी है। दल का कहना है कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लोबल वार्मिंग का असर अब साफ तौर पर दिखाई देने लगा है, जिसके कारण बर्फीली चोटियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है।
ग्लेशियरों के पिघलने और बर्फ की मात्रा कम होने के कारण पर्वतारोहियों को इस बार कई स्थानों पर बदले हुए सामान्य मार्गों का सामना करना पड़ा। दल ने बताया कि पहले जहां बर्फ पर चढ़ाई होती थी, वहीं अब बर्फ की जगह खुली चट्टानों पर चढ़ाई करनी पड़ी। खड़ी और संवेदनशील चट्टानों वाले हिस्सों में सुरक्षित आगे बढ़ने के लिए उन्हें रस्सियों की मदद लेनी पड़ी और फिक्स रोप लगाकर चढ़ाई पूरी करनी पड़ी।

पर्वतारोहियों ने भविष्य को लेकर चेतावनी देते हुए कहा कि यदि वैश्विक तापमान इसी दर से बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में हिमालय की कई प्रमुख बर्फीली चोटियों का अस्तित्व और स्वरूप पूरी तरह से बदल सकता है। जिन क्षेत्रों में पहले मोटी बर्फ की चादर दिखाई देती थी, वहां अब बड़ी मात्रा में नंगी चट्टानें नजर आने लगी हैं। यह स्थिति ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने और पर्यावरणीय असंतुलन का स्पष्ट संकेत है।
