Srinagar me Chikitsa Jyotish par gambhir manthan

ब्रह्मांड और मानव शरीर का अटूट रिश्ता: श्रीनगर में ‘चिकित्सा ज्योतिष’ पर गंभीर मंथन, मानसिक स्वास्थ्य पर चंद्रमा के प्रभाव का हुआ विश्लेषण।

श्रीनगर गढ़वाल। क्या मानव शरीर केवल मांस, हड्डियों और रक्त का एक जैविक ढांचा है, या यह ब्रह्मांड का एक सूक्ष्म प्रतिबिंब है? इसी गहन और दार्शनिक प्रश्न के इर्द-गिर्द श्रीनगर के बीरचंद्र सिंह गढ़वाली राजकीय आयुर्वेदिक शोध संस्थान में एक बेहद विशिष्ट और विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। हिमालय ज्योतिष संरक्षण एवं विकास परिषद के तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी का केंद्र बिंदु ‘चिकित्सा ज्योतिष’ रहा। यहां आयुर्वेद, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र के बीच के अंतर्संबंधों पर कोई अंधविश्वासपूर्ण बहस नहीं हुई, बल्कि विशेषज्ञों ने ग्रहों, नक्षत्रों और मानव शरीर की संरचना के बीच के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक रिश्तों का सूक्ष्म विश्लेषण किया। डॉ. दीपक द्विवेदी के सधे हुए संचालन में चली इस संगोष्ठी ने यह साबित करने का प्रयास किया कि कैसे आकाशीय पिंडों की गतिविधियां जमीन पर इंसान की सेहत को प्रभावित करती हैं।

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ब्रह्मांड और मानव शरीर के बीच के इस अटूट रिश्ते को विज्ञान के तराजू पर तौलते हुए डॉ. प्रकाश चमोली ने एक बेहद तर्कसंगत पक्ष रखा। उन्होंने बताया कि मानव शरीर में लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा जल का है। जिस प्रकार चंद्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति समुद्रों में ज्वार-भाटे पैदा करती है, ठीक उसी प्रकार ब्रह्मांडीय गतिविधियों और खगोलीय पिंडों का प्रभाव मानव शरीर के आंतरिक जलीय तंत्र और भचक्र पर भी पड़ता है। इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए प्रो. रामानन्द गैरोला ने राशियों और मानव अंगों के संबंधों का गहराई से विश्लेषण किया। उन्होंने विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य पर चंद्रमा के प्रभाव को रेखांकित किया। प्रो. गैरोला के अनुसार, जिस तरह समुद्र की लहरें चंद्रमा से प्रभावित होती हैं, उसी तरह मानव मस्तिष्क और मानसिक स्वास्थ्य भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं है। उन्होंने अवसाद और मानसिक रोगों से पीड़ित मरीजों का उदाहरण देते हुए बताया कि उनके व्यवहार और बीमारी की तीव्रता में समय-समय पर जो परिवर्तन देखने को मिलते हैं, उनका सीधा संबंध चंद्रमा की स्थितियों से होता है।

चिकित्सा ज्योतिष को केवल भविष्य बताने तक सीमित न रखते हुए, इसे एक निदानात्मक विज्ञान के रूप में कैसे स्थापित किया जा सकता है, इस पर परिषद के अध्यक्ष आचार्य भाष्करानन्द अणथ्वाल, प्रो. रामानन्द गैरोला और डॉ. प्रकाश चमोली ने संयुक्त रूप से प्रकाश डाला। वक्ताओं ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र में ग्रहों का सीधा संबंध मानव शरीर के विशिष्ट अंगों से माना गया है। उदाहरण के तौर पर, सूर्य का संबंध हड्डियों और मज्जा से है, जबकि चन्द्रमा स्नायु तंत्र और सर्दी-जुकाम जैसी समस्याओं को नियंत्रित करता है। इसी प्रकार, मंगल ग्रह का संबंध शरीर में सूजन, शल्य चिकित्सा (सर्जरी) और गांठ जैसी जटिलताओं से जोड़कर देखा जाता है। इन ग्रहीय स्थितियों का अध्ययन करके न केवल रोगों की प्रवृत्ति और दीर्घकालिक बीमारियों के संकेतों को पहले ही भांपा जा सकता है, बल्कि जातक की दशाओं के आधार पर शरीर के कमजोर अंगों की भी पहचान की जा सकती है।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान जहां शरीर के रोगों को दवाओं से ठीक करने पर जोर देता है, वहीं चिकित्सा ज्योतिष मरीज के मनोबल और आंतरिक शक्ति को जागृत करने का कार्य करती है। आचार्य भाष्करानन्द अणथ्वाल ने इस पहलू को बेहद संवेदनशीलता से रखा। उन्होंने बताया कि चिकित्सा ज्योतिष, आधुनिक विज्ञान और आयुर्वेद का समन्वय गंभीर रोगियों का मनोबल बढ़ाने में एक वरदान साबित हो सकता है। जब मरीज मानसिक रूप से मजबूत होता है, तो दवाओं का असर भी तेजी से होता है। उन्होंने बताया कि चिकित्सकों के परामर्श के साथ-साथ योग, मंत्र जाप, शुभ मुहूर्त और प्रश्न कुंडली जैसे उपायों का उपयोग मरीज को मनोवैज्ञानिक रूप से सशक्त बनाने के लिए किया जा सकता है। उन्होंने इसके व्यावहारिक उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे महामृत्युंजय मंत्र का जाप और हृदय रोगियों के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ उनके भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा और मानसिक शांति उत्पन्न करता है, जो रिकवरी प्रक्रिया को तेज करता है।

संगोष्ठी के समापन पर संस्थान के प्राचार्य डॉ. आशुतोष सयाना, वित्त नियंत्रक प्रशांत कुमार शर्मा और एमएस डॉ. राकेश रावत ने इस अंतर्विषयक संवाद की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जनहित में आयुर्वेद, चिकित्सा विज्ञान और हमारे पारंपरिक ज्ञान को एक मंच पर लाने वाली ऐसी संगोष्ठियों का नियमित आयोजन होना चाहिए। उनका मानना था कि जब अलग-अलग विधाओं के विशेषज्ञ एक साथ बैठते हैं, तो समाज को न केवल नई और शोधपरक जानकारी प्राप्त होती है, बल्कि विभिन्न विषयों पर एक सार्थक और रचनात्मक संवाद को भी बढ़ावा मिलता है, जो अंततः मानव कल्याण का ही मार्ग प्रशस्त करता है।

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