डॉ. अम्बेडकर उत्कृष्टता केंद्र एवं निःशुल्क कोचिंग योजना, उत्तराखण्ड की ओर से ‘वनाग्नि: कारण एवं परिणाम’ विषय पर आयोजित साप्ताहिक ऑनलाइन परिचर्चा के दौरान जब राज्य के जंगलों में लग रही आग के आंकड़े सामने रखे गए, तो वहां मौजूद विद्यार्थियों और संकाय सदस्यों के बीच गहरी चिंता देखी गई।

कार्यक्रम की शुरुआत वनाग्नि के स्वरूप और उसके कारणों की बारीकियों से हुई। बताया गया कि आकाशीय बिजली और ज्वालामुखी विस्फोट जैसे प्राकृतिक कारणों के अलावा मानवीय लापरवाही इसकी सबसे बड़ी वजह है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, भारत में करीब 95 प्रतिशत वनाग्नि की घटनाएं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मानवजनित गतिविधियों का ही नतीजा हैं, जबकि हिमालयी क्षेत्रों में मई से जुलाई के बीच इन घटनाओं में भारी उछाल आता है।
ऑनलाइन परिचर्चा के दौरान विद्यार्थियों ने उत्तराखण्ड के मौजूदा संकट का एक चिंताजनक चित्र प्रस्तुत किया। उनके द्वारा साझा किए गए तथ्यों के अनुसार, महज पिछले तीन महीनों में राज्य में 370 से अधिक वनाग्नि की घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं। उत्तराखण्ड अब देश के सर्वाधिक प्रभावित राज्यों की सूची में शामिल हो चुका है, जहां पिछले वर्षों के मुकाबले आग लगने की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।
चर्चा के क्रम में ग्रामीण इलाकों की एक स्थानीय प्रवृत्ति की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया, जहां पशुओं के लिए नई घास उगाने के मकसद से जंगलों में आग लगाई जाती है, जो बाद में लापरवाही के कारण विकराल रूप धारण कर लेती है। इससे न केवल वायु प्रदूषण और श्वसन रोगों का खतरा बढ़ता है, बल्कि यह पर्यावरणीय और कानूनी दोनों ही दृष्टिकोण से गंभीर विषय बन जाता है।
वन्यजीवों और पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ रहे प्रभावों पर विस्तार से चर्चा करते हुए प्रतिभागियों ने हिमालयी मोनाल जैसे भूमि पर घोंसला बनाने वाले पक्षियों की दुर्दशा को रेखांकित किया। बार-बार लगने वाली आग इनके घोंसलों को राख में बदल देती है, भोजन के स्रोत खत्म हो जाते हैं और प्रजनन प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होती है, जिससे पक्षी विविधता पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।
इसी कड़ी में संकाय सदस्य डॉ. शैलेन्द्र ने मिट्टी की सेहत पर पड़ रहे असर का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि बार-बार आग लगने से मृदा की उर्वरता और पोषक तत्व नष्ट हो रहे हैं, जिससे मृदा अपरदन (Soil Erosion) बढ़ रहा है और दीर्घकालीन पारिस्थितिकीय स्थिरता डगमगा रही है। वहीं, डॉ. वीर सिंह ने हिमालयी क्षेत्रों पर पड़ रहे जलवायुगत प्रभावों को समझाते हुए बताया कि वनाग्नि के कारण सतही परावर्तन (Albedo) बदल जाता है। इससे हिम के पिघलने की रफ्तार तेज हो जाती है, जो क्षेत्रीय जलवायु को प्रभावित करके जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को और गंभीर बना देता है।
तकनीकी और प्रबंधन पक्ष पर प्रकाश डालते हुए संकाय सदस्य डॉ. अरविंद सिंह रावत ने सभागार में ‘फायर ट्रायंगल’ (ईंधन, ऑक्सीजन और ऊष्मा) के सिद्धांत को समझाया, जिसके संयोजन से आग जन्म लेती और फैलती है। उन्होंने चेताया कि क्राउन फायर (Crown Fire) वनाग्नि का सबसे खतरनाक स्वरूप है और हिमालयी क्षेत्र इसके प्रति बेहद संवेदनशील हैं। डॉ. रावत ने ‘वन अग्नि जियो-पोर्टल प्रणाली’ (Van Agni Geo-Portal System) का जिक्र करते हुए बताया कि कैसे एसएमएस अलर्ट के जरिए समय पर सूचनाएं मिल सकती हैं। उन्होंने वन पंचायतों और वन विभाग के बीच तालमेल बढ़ाकर सशक्त प्रबंधन की वकालत की।
केंद्र के समन्वयक प्रो. एम.एम. सेमवाल ने वनाग्नि को केवल जंगलों तक सीमित समस्या मानने से इनकार किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह उत्तराखण्ड के जल संसाधनों और पर्यटन पर आधारित अर्थव्यवस्था की रीढ़ को भी गंभीर चोट पहुंचा रही है। प्रो. सेमवाल ने सुझाव दिया कि आग लगने के मौसम (मई-जून) का इंतजार करने के बजाय, अक्टूबर और नवंबर से ही योजनाबद्ध तैयारियां शुरू हो जानी चाहिए। उन्होंने आपदा प्रबंधन विभाग, वन विभाग और स्थानीय समुदाय के बीच समन्वय की जरूरत जताते हुए कहा कि दीर्घकालीन पर्यावरणीय योजना, जन-जागरूकता और नागरिक समाज की सक्रिय भागीदारी ही इस समस्या का स्थायी समाधान है।
कार्यक्रम के अंतिम संवादात्मक सत्र में आकाश कश्यप, साक्षी वर्मा, सौरभ कुमार, दीपक कुमार मावत, प्रियांशु और आंचल सहित कई विद्यार्थियों ने सामुदायिक सहभागिता और सतत वन प्रबंधन से जुड़े अपने सुझाव रखे। डॉ. आशीष बहुगुणा द्वारा संचालित इस परिचर्चा में डॉ. प्रकाश कुमार सिंह और डॉ. मुकेश सहाय सिंह सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी मौजूद रहे, जिन्होंने समसामयिक पर्यावरणीय चुनौतियों के प्रति संवेदनशील बनने और जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया।
