श्रीनगर गढ़वाल। पहाड़ों में इंसान और पशुओं का रिश्ता सदियों पुराना है, लेकिन यही करीबी रिश्ता आज कई खामोश और घातक बीमारियों का रास्ता भी बन रहा है। पशुओं से इंसानों में फैलने वाली संक्रामक बीमारियां (जूनोटिक रोग) अब स्वास्थ्य विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी हैं। इसी खतरे को भांपते हुए राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर ने ‘वन हेल्थ’ (एक स्वास्थ्य) की अवधारणा को जन-जन तक पहुंचाने की मुहिम छेड़ दी है। विश्व जूनोटिक रोग दिवस पर कॉलेज के एमबीबीएस और पैरामेडिकल छात्रों ने सड़कों पर उतरकर न केवल जागरूकता रैली निकाली, बल्कि यह संदेश भी दिया कि जब तक पशु और पर्यावरण सुरक्षित नहीं होंगे, इंसान का स्वास्थ्य भी सुरक्षित नहीं रह सकता।

इस वर्ष की थीम ‘सामुदायिक सहभागिता से जूनोटिक रोगों की रोकथाम’ को जमीन पर उतारने के लिए प्राचार्य डॉ. आशुतोष सयाना के निर्देशन में माइक्रोबायोलॉजी और कम्युनिटी मेडिसिन विभाग ने संयुक्त मोर्चा खोला। कॉलेज परिसर से निकली रैली में छात्रों के हाथों में थामे तख्तियां आमजन को यह एहसास दिला रही थीं कि पशुओं की नियमित जांच, समय पर टीकाकरण और व्यक्तिगत स्वच्छता कोई विकल्प नहीं, बल्कि जीवन रक्षक कवच हैं। कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की टीम ने फील्ड प्रैक्टिस एरिया के गांवों में पहुंचकर ग्रामीणों को इन बीमारियों की पहचान और समय पर उपचार की बारीकियां समझाईं, क्योंकि पहाड़ी क्षेत्रों में मवेशियों के साथ रहन-सहन के कारण संक्रमण का खतरा हमेशा बना रहता है।
माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. विनीता रावत ने एक गहरी चिकित्सीय सच्चाई बयां की कि जूनोटिक रोगों पर केवल अस्पतालों के बेड पर काबू नहीं पाया जा सकता। इसके लिए पशुपालन विभाग, स्थानीय निकाय और आम नागरिकों का एक संयुक्त तंत्र बनना जरूरी है। जागरूकता और समय पर टीकाकरण ही ऐसे हथियार हैं, जो इन रोगों के खतरे को काफी हद तक निष्क्रिय कर सकते हैं। वहीं, कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जानकी बर्तवाल ने सामुदायिक भागीदारी पर जोर देते हुए कहा कि सही जानकारी ही सबसे बड़ा टीका है। यदि हर परिवार पशुओं के सुरक्षित रखरखाव और साफ-सफाई के नियमों का पालन करे, तो रेबीज से लेकर ब्रुसेलोसिस जैसे गंभीर रोगों की चेन को वहीं तोड़ा जा सकता है।
चर्चा का सबसे अहम और वैज्ञानिक पहलू तब सामने आया जब विभाग के डॉ. सुरेंद्र सिंह ने ‘वन हेल्थ’ (One Health) के सिद्धांत को समझाया। उन्होंने बताया कि प्रकृति का नियम है कि मनुष्य, पशु और पर्यावरण एक ही धागे में पिरोए गए हैं। यदि जंगल और पर्यावरण का संतुलन बिगड़ेगा, तो निपाह वायरस जैसे नए खतरे इंसानी बस्तियों में दस्तक देंगे। इसलिए इन बीमारियों की रोकथाम केवल एक विभाग का काम नहीं, बल्कि तीनों के बीच सामंजस्य और संतुलन का परिणाम है।
चिकित्सा विज्ञान की मानें तो जूनोटिक रोग वायरस, बैक्टीरिया, परजीवी या फंगस के कारण होते हैं। संक्रमित पशुओं के सीधे संपर्क, उनके काटने, खरोंच या फिर दूषित भोजन और पानी के जरिए ये इंसानों में प्रवेश करते हैं। रेबीज, ब्रुसेलोसिस, लेप्टोस्पायरोसिस, एंथ्रेक्स, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, निपाह वायरस संक्रमण, स्क्रब टाइफस, टॉक्सोप्लाज्मोसिस और साल्मोनेला जैसे रोग इसी श्रेणी में आते हैं, जो सही समय पर इलाज न मिलने पर जानलेवा भी साबित हो सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार बचाव का सूत्र बेहद सरल लेकिन अत्यंत प्रभावी है। पालतू पशुओं का नियमित टीकाकरण कराना, पशुओं के संपर्क के बाद साबुन से हाथों को अच्छी तरह धोना, दूध और मांस को पूरी तरह से पकाकर या उबालकर सेवन करना अनिवार्य है। बीमार या आवारा पशुओं से अनावश्यक संपर्क बनाना और पशु के काटने या खरोंच लगने पर तुरंत चिकित्सकीय उपचार लेना इन बीमारियों से बचने का सबसे सुरक्षित कवच है।
इस व्यापक जन-जागरूकता अभियान में डॉ. अनिल कुमार, डॉ. जितेन्द्र चन्द्र देवराड़ी सहित तमाम संकाय सदस्यों और सैकड़ों छात्र-छात्राओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। श्रीनगर मेडिकल कॉलेज की यह पहल केवल एक दिवसीय कार्यक्रम भर नहीं है, बल्कि गढ़वाल के सुदूर इलाकों में स्वास्थ्य सुरक्षा की एक नई दीवार खड़ी करने का एक सार्थक प्रयास है, जो यह साबित करता है कि बीमारी का इलाज करने से कहीं बेहतर है कि उसके मूल कारणों को जड़ से खत्म किया जाए।
