श्रीनगर गढ़वाल। जलवायु परिवर्तन और बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के दौर में हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की नाजुकता एक गंभीर वैश्विक चिंता का विषय बन गई है। इसी संवेदनशील मुद्दे पर मंथन करने और युवा पीढ़ी को जागरूक करने के उद्देश्य से हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिमालयन एक्वेटिक बायोडायवर्सिटी विभाग में ‘हिमालय दिवस’ के अवसर पर एक विशेष व्याख्यान कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य फोकस हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ती आपदाओं के सामाजिक, आर्थिक और मानवीय प्रभावों तथा पर्यावरण संरक्षण की दीर्घकालिक रणनीतियों पर केंद्रित रहा।

कार्यक्रम का शुभारंभ विभागाध्यक्ष डॉ. जसपाल सिंह चौहान के स्वागत उद्बोधन से हुआ। अपने संबोधन में डॉ. चौहान ने हाल ही में नेपाल और तिब्बत में आई भीषण बाढ़ की विनाशकारी घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिमालय केवल भारतीय उपमहाद्वीप की प्राकृतिक धरोहर नहीं है, यह संपूर्ण विश्व के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र है। इसलिए, इसका संरक्षण अब केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं रह गया है यह एक वैश्विक पारिस्थितिक आवश्यकता बन चुका है। उन्होंने हिमालय दिवस जैसे अवसरों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों, विशेषकर विद्यार्थियों और शोधार्थियों में संरक्षण के प्रति व्यापक जागरूकता उत्पन्न करने पर बल दिया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं डॉ. अम्बेडकर उत्कृष्टता केंद्र के डॉ. अरविंद सिंह रावत ने “द ह्यूमन फेस ऑफ हिमालयन डिजास्टर” (The Human Face of Himalayan Disaster) विषय पर अत्यंत सारगर्भित और तथ्यात्मक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने हिमालयी आपदाओं के मानवीय पक्ष पर गहराई से प्रकाश डालते हुए बताया कि भूकंप, भूस्खलन और बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव केवल भौतिक संरचनाओं और बुनियादी ढांचे के विनाश तक सीमित नहीं रहता। इसके दूरगामी सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक प्रभाव भी सामने आते हैं, जो पहाड़ी समुदायों की जीवनशैली और आजीविका को पूरी तरह से प्रभावित करते हैं।
भविष्य में आपदाओं के जोखिम और उनके प्रभाव को कम करने की रणनीति पर चर्चा करते हुए डॉ. रावत ने बहुविषयक (Multidisciplinary) एवं क्षेत्र-विशिष्ट शोध की तत्काल आवश्यकता पर विशेष जोर दिया। उन्होंने उत्तराखंड सरकार द्वारा आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी सराहना की। इस क्रम में उन्होंने ‘उत्तराखंड भूकंप अलर्ट ऐप भूदेव’ और ‘आपदा मित्र योजना’ जैसे सफल और नवोन्मेषी प्रयासों का उल्लेख किया, जो जमीनी स्तर पर आपदा प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने और त्वरित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
व्याख्यान के पश्चात एक सार्थक प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों ने मुख्य वक्ता एवं अन्य विशेषज्ञों के साथ हिमालयी पर्यावरण और आपदा प्रबंधन से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श किया। कार्यक्रम के अंत में डॉ. कौशल कुमार ने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर डॉ. प्रशांत आर्य, डॉ. आशीष बहुगुणा, डॉ. सुरेंद्र पुरी, डॉ. प्रकाश कुमार, डॉ. पंकज कुमार, डॉ. वीर सिंह और डॉ. शैलेंद्र चमोला सहित विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। शोधार्थियों दीप्ति सेमवाल एवं अब्दुल वारिश द्वारा संचालित इस कार्यक्रम ने अंततः “हिमालय संरक्षण—हमारी सामूहिक जिम्मेदारी” का एक सशक्त और स्पष्ट संदेश दिया।
