देहरादून।
श्री बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) पर एक बार फिर फंड दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता व अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने आरटीआई दस्तावेजों के आधार पर दावा किया है कि समिति ने नियमों की अनदेखी करते हुए केदारनाथ के तीर्थ-पुरोहितों की संस्था ‘केदार सभा’ को 11 लाख रुपये का भुगतान किया।अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने देहरादून कचहरी परिसर स्थित अपने कार्यालय में पत्रकारों से बातचीत करते हुए बताया कि वर्ष 2025 में केदारनाथ धाम में 25 जुलाई से 1 अगस्त तक श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन हुआ था।

आयोजन समाप्त होने के करीब ढाई महीने बाद 12 अक्टूबर 2025 को बीकेटीसी ने दो अलग-अलग नोटशीट तैयार कर यह भुगतान स्वीकृत किया। इन नोटशीट्स पर तत्कालीन मुख्य कार्याधिकारी विजय थपलियाल, उपाध्यक्ष विजय सिंह कप्रवाण और अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी के हस्ताक्षर हैं। विकेश सिंह नेगी ने आरोप लगाया कि पूरे भुगतान प्रक्रिया में वित्त नियंत्रक की सहमति नहीं ली गई, जो वित्तीय नियमों का उल्लंघन है। नोटशीट में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि केदार सभा ने लिखित आवेदन दिया था या केवल मौखिक अनुरोध किया गया था। संबंधित पत्र भी उपलब्ध नहीं कराया गया।

नेगी ने यह भी बताया कि 10 अक्टूबर 2025 को केदार सभा ने बीकेटीसी अध्यक्ष हेमंत द्विवेदी की कार्यशैली के खिलाफ मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर आंदोलन की चेतावनी दी थी। इसके मात्र दो दिन बाद 12 अक्टूबर को भुगतान की स्वीकृति दी गई, जिससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। इसके अलावा केदारनाथ में भागवत कथा की लाइव स्ट्रीमिंग के लिए ‘तीतर मीडिया एंड एडवर्टाइजिंग कंपनी’ को 1.5 लाख रुपये का भुगतान भी संदेह के घेरे में है। कोटेशन प्रक्रिया में तीनों कंपनियों के कोटेशन एक ही तारीख पर और लगभग एक जैसी भाषा में प्राप्त होने का मामला सामने आया है।
अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से बीकेटीसी में लगे इन आरोपों की उच्चस्तरीय जांच कराने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि बदरीनाथ और केदारनाथ धाम करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं। ऐसे में मंदिर समिति में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है।नेगी ने आरटीआई के माध्यम से प्राप्त अन्य दस्तावेजों का भी जिक्र किया, जिनमें समिति के उपाध्यक्ष विजय सिंह कप्रवाण द्वारा अपनी पत्नी को चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दिखाकर वेतन लेने और विशेष आमंत्रित सदस्यों की नियुक्ति में नियमों की अनदेखी जैसे मामले शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते इन मामलों में उचित कार्रवाई नहीं हुई तो मंदिर प्रबंधन की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
