Pahad ke yuvaon ka civil services ka sapna ab hoga poora

पहाड़ के युवाओं का सिविल सेवा का सपना अब होगा पूरा, एचएनबी विवि में युवा डीएसपी ने खोले सफलता के ‘स्मार्ट’ सूत्र, AI के सही इस्तेमाल पर दिया जोर।

श्रीनगर गढ़वाल। पहाड़ी क्षेत्रों के मेधावी युवाओं में सिविल सेवा में जाने का जज्बा तो कूट-कूट कर भरा होता है, लेकिन सही रणनीति और मार्गदर्शन के अभाव में अक्सर उनका यह सपना बिखर जाता है। इसी खाई को पाटने और पहाड़ के बच्चों को महानगरों के कोचिंग सेंटर्स की दौड़ से बाहर निकालकर उनके अपने ही परिसर में ‘स्मार्ट स्टडी’ का मंत्र देने के लिए हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में एक बेहद गंभीर और परिणामोन्मुखी सत्र का आयोजन किया गया। डॉ. भीमराव अंबेडकर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस एवं निःशुल्क सिविल सेवा कोचिंग योजना के तहत आयोजित इस विशेष व्याख्यान में सैद्धांतिक ज्ञान से इतर, जमीनी हकीकत और परीक्षा भवन के मनोविज्ञान को समझने पर गहरा मंथन हुआ।

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कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए प्रो. एम. एम. सेमवाल ने पहाड़ के उन विद्यार्थियों के सामने एक कड़वा सच रखा जो केवल कठोर परिश्रम को ही सफलता की एकमात्र कुंजी मानते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिविल सेवा जैसी प्रतिष्ठित और बहुआयामी परीक्षा में केवल किताबों में सिर खपाना काफी नहीं है; सफलता स्पष्ट लक्ष्य, अनुशासित समय प्रबंधन और निरंतर आत्ममूल्यांकन का नाम है। प्रो. सेमवाल ने विश्वविद्यालय द्वारा संचालित निःशुल्क कोचिंग योजना का जिक्र करते हुए कहा कि यह योजना उन ग्रामीण और वंचित वर्ग के छात्रों के लिए एक सशक्त हथियार है, जो आर्थिक कारणों से महंगी कोचिंग नहीं ले सकते। उन्होंने छात्रों से इस अवसर का अधिकतम और गंभीरता से लाभ उठाने का आह्वान किया।

सत्र का सबसे प्रभावशाली और व्यावहारिक हिस्सा तब शुरू हुआ जब उत्तराखंड सरकार के 2024 बैच के युवा डीएसपी मनीष रमोला ने मुख्य वक्ता के रूप में मंच संभाला। चूंकि वे स्वयं हाल ही में इस कठिन प्रक्रिया से गुजरे हैं, इसलिए उनकी बातों में किताबी ज्ञान से ज्यादा जमीनी अनुभवों और संघर्ष की झलक थी। उन्होंने यूपीएससी, यूकेपीएससी और सीएपीएफ परीक्षाओं के पर्दे के पीछे के खेल को बेनकाब किया। रमोला ने ‘स्मार्ट स्टडी’ की अवधारणा को विस्तार से समझाते हुए कहा कि किताबों का अंबार लगाने के बजाय सीमित और प्रमाणिक स्रोतों पर पकड़ मजबूत करना ही असली रणनीति है। उन्होंने समसामयिक घटनाओं के विश्लेषण और उत्तर लेखन के निरंतर अभ्यास को सफलता का सबसे बड़ा पैमाना बताया।

परीक्षा भवन के दबाव को कैसे झेलें, इस पर डीएसपी रमोला ने एक व्यावहारिक नुस्खा दिया। उन्होंने कहा कि मॉक टेस्ट और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों को ठीक उसी समय और उसी वातावरण में हल करना चाहिए, जैसा असली परीक्षा में होता है। इससे न केवल समय प्रबंधन में महारत हासिल होती है, बल्कि कठिन प्रश्नों को छोड़ने और आसान को चुनने की मानसिक क्षमता भी विकसित होती है, जो अंततः परीक्षा हॉल में मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद करती है।

आज के डिजिटल दौर में जहां हर तरफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का बोलबाला है, रमोला ने इसके उपयोग पर एक बेहद संतुलित और गंभीर दृष्टिकोण रखा। उन्होंने माना कि एआई नोट्स बनाने, कठिन विषयों को सरल करने और डेटा को व्यवस्थित करने में एक बेहतरीन सहायक हो सकता है, लेकिन उन्होंने छात्रों को सचेत भी किया कि एआई कभी भी उनकी अपनी विश्लेषणात्मक सोच और मौलिकता की जगह नहीं ले सकता। अंततः परीक्षा भवन में आपका अपना दिमाग और आपकी अपनी समझ ही काम आएगी, न कि कोई डिजिटल टूल।

डॉ. अरविंद सिंह रावत के कुशल संचालन में चले इस सत्र में एकतरफा भाषणों के बजाय संवाद पर अधिक जोर दिया गया। डॉ. आशीष बहुगुणा, डॉ. प्रकाश सिंह, डॉ. वीर सिंह, डॉ. शैलेन्द्र चमोला और डॉ. मुकेश सहाय जैसे वरिष्ठ शिक्षकों की मौजूदगी ने सत्र को एक अकादमिक गंभीरता प्रदान की। छात्रों ने बेझिझक होकर अध्ययन सामग्री, इंटरव्यू के मनोविज्ञान और करियर की दुविधाओं पर सवाल दागे, जिनका रमोला ने अपने स्वयं के अनुभवों से विस्तृत और प्रेरणादायक उत्तर दिया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. एम. एम. सेमवाल ने इस पूरे आयोजन को पहाड़ के युवाओं के लिए एक नई दिशा का सूचक बताया। उन्होंने कहा कि ऐसे सत्र केवल जानकारी नहीं देते, बल्कि विद्यार्थियों के अंदर छिपी हीन भावना को तोड़कर आत्मविश्वास का संचार करते हैं। उन्होंने छात्रों से अपील की कि वे आज प्राप्त हुए इस ‘ब्लूप्रिंट’ को अपनी दैनिक दिनचर्या में उतारें। पहाड़ के युवाओं में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, बस जरूरत है तो सही दिशा और अटूट अनुशासन की, जो इस निःशुल्क कोचिंग योजना और ऐसे मार्गदर्शक सत्रों से मिल रही है। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों के उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ इस गंभीर मंथन का समापन हुआ।

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