श्रीनगर गढ़वाल। अस्पताल वह पवित्र जगह होती है जहां लोग भगवान रुपी डॉक्टर से अपना इलाज करवाने आते हैं, लेकिन क्या हो अगर अस्पताल से निकलने वाला खतरनाक कचरा शहर की सड़कों और कूड़ाघरों में मौत का सामान बांटने लगे? श्रीनगर गढ़वाल के बेस चिकित्सालय श्रीकोट से जुड़ी एक ऐसी ही खौफनाक और रोंगटे खड़े कर देने वाली लापरवाही सामने आई है, जिसने न केवल प्रशासनिक तंत्र को झकझोर दिया है, बल्कि शहर के सफाईकर्मियों की जान पर भी बड़ा खतरा मंडराने लगा है। इलाज के बाद निकलने वाले खतरनाक बायोमेडिकल वेस्ट को चुपके से नगर निगम की सामान्य कूड़ा गाड़ियों में डालकर ट्रेंचिंग ग्राउंड तक पहुंचाया जा रहा है। नगर निगम की सतर्कता से समय रहते ये बड़ी लापरवाही पकड़ी गयी है।

घटना का खुलासा 23 जून की शाम को हुआ। ट्रेंचिंग ग्राउंड पर जब नगर निगम के मुख्य स्वास्थ्य निरीक्षक शशि पंवार रूटीन निरीक्षण कर रहे थे, तभी बेस अस्पताल श्रीकोट से आई एक कूड़ा गाड़ी वहां पहुंची। आम तौर पर अस्पतालों का कचरा अलग वाहनों से आना चाहिए, लेकिन इस गाड़ी में शहर के आम घरों और बाजारों का कचरा मिला हुआ था। शक की सुई घूमी और जब अधिकारियों ने गाड़ी में पड़े कचरे को खंगालना शुरू किया, तो उनके होश उड़ गए। कचरे के ढेर के बीच नीली, पीली, हरी और लाल रंग की प्लास्टिक थैलियां बिखरी पड़ी थीं। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में ये रंग सामान्य नहीं होते, ये सीधे तौर पर खतरनाक और संक्रामक कचरे की पहचान हैं।
जैसे ही इन रंगीन थैलियों को फाड़कर जमीन पर उलटा गया, तो वहां का मंजर किसी डरावने सपने से कम नहीं था। इन थैलियों के अंदर इस्तेमाल हो चुकी और बिना डिस्पोज की गई सिरिंज, नुकीले कैन्यूला, ड्रिप की प्लास्टिक बोतलें, यूरिन ब्लैडर और बीटाडिन से सना कचरा मिला। सबसे भयावह दृश्य तब सामने आया जब इनमें मरीजों के खून से सने ग्लव्स, रुई, बैंडेज और अन्य अत्यधिक संक्रमित सामग्री बरामद हुई। जरा सोचिए, ट्रेंचिंग ग्राउंड पर काम करने वाले ‘पर्यावरण मित्र’ (सफाई कर्मी) जब बिना किसी सुरक्षा कवच के इस कचरे को हाथों से छांटते हैं, तो एक साधारण सी सुई चुभने या खून से सने कपड़े के संपर्क में आने से एचआईवी, हेपेटाइटिस-बी या किसी घातक सेप्सिस का शिकार हो सकते हैं। यह लापरवाही सीधे तौर पर सैकड़ों सफाईकर्मियों और उनके परिवारों की जिंदगी से खिलवाड़ है।

कानूनी और प्रशासनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह मामला केवल एक चूक नहीं, बल्कि ‘सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स-2026’ का खुला और सुनियोजित उल्लंघन है। कानून स्पष्ट कहता है कि नगर निगम केवल घरेलू और सामान्य व्यावसायिक कचरे के निस्तारण के लिए जिम्मेदार है। अस्पतालों जैसे ‘बल्क वेस्ट जनरेटर’ को अपने बायोमेडिकल कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए अधिकृत एजेंसियों से टाई-अप करना और खुद जिम्मेदारी लेनी होती है। लेकिन मुनाफे और लागत को बचाने के चक्कर में अस्पताल के अंदर हाउसकीपिंग का काम संभालने वाली निजी फर्म नियमों की धज्जियां उड़ा देती है। निगम अधिकारियों ने मौके पर ही जीपीएस आधारित फोटोग्राफ और वीडियो के रूप में पुख्ता सबूत सुरक्षित कर लिए, ताकि बाद में कोई भी पलटवार न कर सके।
इस संस्थागत अपराध के लिए नगर निगम ने तत्काल एक्शन लेते हुए मैसर्स निर्मल फैसिलिटी फर्म पर पर्यावरण और मानवीय जीवन से किए गए इस खिलवाड़ के एवज में 50 हजार रुपये का जुर्माना ठोका है। निगम ने साफ चेतावनी दी है कि तीन दिन के भीतर यह जुर्माना राजकोष में जमा नहीं किया गया, तो आगे की कड़ी कानूनी कार्रवाई जैसे कदम उठाए जाएंगे।

नगर निगम की महापौर आरती भंडारी ने जब इस रिपोर्ट को देखा तो उन्होंने इसे एक बेहद अमानवीय और गैर-जिम्मेदाराना कृत्य करार दिया। उनका स्पष्ट मत है कि मेडिकल वेस्ट को सामान्य कूड़े में मिलाना किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह सीधे तौर पर लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ है और सफाई कर्मियों के अधिकारों का हनन है। महापौर ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं कि दोषियों के खिलाफ कोई भी रियायत न बरती जाए।
यह घटना स्वास्थ्य विभाग के आंतरिक निगरानी तंत्र पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। लेकिन असल सवाल यह है कि आखिर कब तक शहर के गरीब सफाईकर्मी संस्थागत लापरवाही की कीमत अपनी जान देकर चुकाएंगे? प्रशासन को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि श्रीकोट जैसे बेस अस्पतालों में बायोमेडिकल वेस्ट का ऑन-साइट ट्रीटमेंट प्लांट या अधिकृत एजेंसियों के माध्यम से निस्तारण हो और भविष्य में शहर के सभी बड़े अस्पतालों एवं नर्सिंग होम के कचरे का प्रबंधन करने वाले सिस्टम का रैंडम ऑडिट किया जाए, ताकि ट्रेंचिंग ग्राउंड पर कभी कोई खौफनाक मंजर दोबारा देखने को न मिले।
