नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने गरीब और असहाय विचाराधीन कैदियों को राहत देते हुए राज्य सरकारों के लिए नई Standard Operating Procedure (SOP) जारी की है। इसके तहत अब जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) ऐसे कैदियों की जमानत राशि अधिकतम एक लाख रुपये तक भर सकेगा, जिनके पास स्वयं रकम जमा करने की क्षमता नहीं है।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने यह आदेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और न्यायमित्र वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा के सुझावों को स्वीकार करते हुए पारित किया। अदालत ने कहा कि यह कदम ‘गरीब कैदियों को सहायता योजना’ के तहत न्याय तक समान पहुंच सुनिश्चित करेगा।
नई SOP के अनुसार, यदि किसी कैदी की जमानत आदेश के बाद सात दिनों में रिहाई नहीं होती है, तो जेल अधिकारी को DLSA सचिव को सूचना देनी होगी। सचिव यह जांच करेंगे कि कैदी के खाते में आवश्यक जमानत राशि उपलब्ध है या नहीं। अभाव की स्थिति में DLSA पांच दिनों के भीतर अनुरोध भेजेगा, जिसके बाद जिला स्तरीय अधिकार प्राप्त समिति (DLEC) यह धनराशि जारी करेगी।
यह समिति जिला मजिस्ट्रेट के नामित अधिकारी, DLSA सचिव, पुलिस अधीक्षक, जेल अधीक्षक और प्रभारी न्यायाधीश से मिलकर बनेगी। समिति हर माह के पहले व तीसरे सोमवार को बैठक करेगी। जहां भी समिति उपयुक्त माने, वहां प्रति कैदी 50,000 रुपये तक की सहायता राशि ‘सावधि जमा’ या निर्धारित माध्यम से कोर्ट को उपलब्ध कराई जा सकेगी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक यह प्रक्रिया इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) से एकीकृत नहीं हो जाती, तब तक संबंधित सूचनाएं DLSA और जेल अधिकारियों को ईमेल के माध्यम से ही दी जाएंगी। यदि इसके बावजूद पांच दिनों के भीतर जमानत राशि जमा नहीं होती और कैदी रिहा नहीं होता, तो जेल अधिकारी छठे दिन पुनः DLSA को रिपोर्ट करेंगे।
यह निर्णय न्यायपालिका की उस सतत पहल का हिस्सा है जिसका उद्देश्य है—आर्थिक रूप से कमजोर कैदियों को लंबे समय तक जेल में रहने से बचाना और समान न्यायिक पहुँच सुनिश्चित करना।



